Wednesday, 7 August 2024

आशा

 

नूतन स्वर करें गुंजायमान

कोई पुनः ठहरा सन्नाटा

ऊर्जास्वित अनुभूति करें हम

उठे ह्रदय में गर्वान्वित ज्वार भाटा

भिंभीनाती मायूसी हो ओझल

हमारी श्वास के सदृढ़ वेग से

हर पल को करें अनुरंजित हम

हर्ष और आशा के भरपूर नेग से

जो कल कल से हो बेहतर वही ध्येय है

बढ़कर ही पाता रत्नाकर कल कल नदी का

हर दिवस करें हम सृजन जीवन पल

निर्माण करें स्वयं मनवांचित सदी का

No comments:

Post a Comment