नूतन स्वर करें गुंजायमान
कोई पुनः ठहरा सन्नाटा
ऊर्जास्वित अनुभूति करें हम
उठे ह्रदय में गर्वान्वित ज्वार भाटा
भिंभीनाती मायूसी हो ओझल
हमारी श्वास के सदृढ़ वेग से
हर पल को करें अनुरंजित हम
हर्ष और आशा के भरपूर नेग से
जो कल कल से हो बेहतर वही ध्येय है
बढ़कर ही पाता रत्नाकर कल कल नदी का
हर दिवस करें हम सृजन जीवन पल
निर्माण करें स्वयं मनवांचित सदी का
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