Monday, 5 January 2026

 कुछ यूँ उठे मायूसी में आख़िर हौँसले 

कि दिखने लगे बेपर्दा रूह के ऊँचे साये 

तुम्हारी गहरी नज़रों के आईने में अक्सर

तराशते हुए ख़ुद को, हम ने ख़ुद को पाए 

तो क्या कि किवाड़ है क़ैद कब से

और ख़ुद को हम वहीँ छोड़ के आये

अब आज़ाद हैँ परिंदे जन्नत तलक

पर ज़मीन अपना आसमान कहाँ से लाये.

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