कुछ यूँ उठे मायूसी में आख़िर हौँसले
कि दिखने लगे बेपर्दा रूह के ऊँचे साये
तुम्हारी गहरी नज़रों के आईने में अक्सर
तराशते हुए ख़ुद को, हम ने ख़ुद को पाए
तो क्या कि किवाड़ है क़ैद कब से
और ख़ुद को हम वहीँ छोड़ के आये
अब आज़ाद हैँ परिंदे जन्नत तलक
पर ज़मीन अपना आसमान कहाँ से लाये.
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