जलमग्न निरंतर रह कल कल स्वर श्रवण करती
ले जाती बीच प्रवाह के प्रफुल्लित मन के चरण
ढाढ़स बांधती अपनी बेड़ी से स्वच्छन्द मनोरथ का
साहस ही है करता हर इच्छा का वास्तविक रूप में भरण।
सदैव अद्रित उर पर प्रतिबिम्ब नभ का श्रृंगारित होता
स्वर्णिम रश्मि और व्यथित तिमिर का मिश्रित बिछौना
समान धारा में लीन पूजा पुष्प और विसर्जित चिन्ह
पौड़ी बोध कराये ये जीवन तो है केवल क्षणभँगुर खिलौना।
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