Sunday, 7 September 2025

पौड़ी

 


जलमग्न निरंतर रह कल कल स्वर श्रवण करती

ले जाती बीच प्रवाह के प्रफुल्लित मन के चरण

ढाढ़स बांधती अपनी बेड़ी से स्वच्छन्द मनोरथ का

साहस ही है करता हर इच्छा का वास्तविक रूप में भरण।

सदैव अद्रित उर पर प्रतिबिम्ब नभ का श्रृंगारित होता

स्वर्णिम रश्मि और व्यथित तिमिर का मिश्रित बिछौना

समान धारा में लीन पूजा पुष्प और विसर्जित चिन्ह

पौड़ी बोध कराये ये जीवन तो है केवल क्षणभँगुर खिलौना।

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