ग़र्क ए आब है हरदम मेरी रूह
यूँ तो मुसलसल झुलसना
भी देता है इक दर्द भरा सुकूँ
उफ़ान पर अक्सर है ये मन मंज़र
शब भर शबनम बरसे निगाह से
फ़िर भी नज़र है हर तरफ़ बंजर.
दुश्वार है वक्त कि तल्ख़हीओं को सहना
धूप में तन्हा सुलगती सीढ़ी के तले
याद में ठंडी आहों का पिघल कर बहना
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