Tuesday, 21 April 2026

मन का भगवान

 


कबीर का ध्यान अनवरत रूप से भगवान में ही लगा रहता था. उसकी निष्ठा और सादगी से प्रसन्न हो एक बार प्रभु ने उसे दर्शन दिए. बोले, “ मांगो क्या चाहते हो “. 

कबीर के समक्ष स्वयं प्रभु थे  परन्तु उसने ध्यान न दिया. भगवान ने पुनः वरदान देने की चेष्टा की. सुनते ही उसने बिना किसी संकोच या गंभीर सोच के तुरंत ही मांग लिया, “ हे प्रभु! आपको पूजने की सही विधि का ज्ञान दे दीजिये “. 

सुनकर भगवान के आंसू बहने लगे. भक्त की सरलता देखकर वे विस्मित थे. मुस्कराते हुए वे बोले, “ तू प्रत्येक दिन सुबह और सायं कुछ क्षण मेरे भजन सुना कर “. 

कबीर ने सुनकर मन में दोहराया. उसके असमंजस को देखकर भगवान को जिज्ञासा हुई. वे बोले, “ पूछो वत्स, क्या दुविधा है? “.

 निर्भीक भाव से कबीर बड़ी मासूमियत से बोला, “ भगवान, यदि दिन में दो बार भजन सुनूँगा तो क्या अपने मन के भगवान को क्या कुछ देर छोड़ दूँ? “

प्रभु अवाक थे, “ मन का भगवान क्या होता है? कुछ देर छोड़ने से क्या तात्पर्य है? “

मानो आज भगवान की परीक्षा सरल भक्त ले रहा था. कबीर बोला, “ प्रभु! आप तो दिन रात में बहने वाली धारा हैँ. मेरी सांस के साथ आपका ध्यान तैरता है. कभी रात को सोते हुए जाग जाता हूं तो भी आपका ही ध्यान आता है. ऐसे में यदि कुछ देर अलग से आपका भजन सुनना होगा तो अपना ध्यान तोड़ना होगा. बहाव से निकलकर किनारे पर बैठना होगा क्योंकि एक साथ दो स्थान पर ध्यान नहीं जा सकता. कुछ अनुचित कहा उसके लिए क्षमा चाहता हूँ, दुनियादारी से दूर रहा हूं इसलिए ये प्रश्न उठ रहे हैँ. अतः मन के भगवान को कुछ देर के लिए छोड़ना पड़ेगा. “

भगवान कुछ प्रतिक्रिया करते उस से पहले भोर होते ही आस पास के कई धार्मिक स्थल जाग गए और उनके नाम को चीखकर पुकारने लगे. ये दिखाने वाला भगवान था. कदाचित इस भगवान को जताने के लिए ऊँची वाणी में याद करना आवश्यक था. पत्थर पर बैठकर धारा का वर्णन करना था , पानी में भीगना नहीं था. किसी झुरमुट में झींगुर टर्रा रहे थे. कोयल अपने कंठ को तान रही थी. नदी कल-कल बह रही थी. प्रभु कान पर हाथ रखकर, दुनियादारी निभाते हुए कबीर को देखकर मुस्कराये और चल दिए. 

कबीर को अपना दोष पता नहीं चलने का पछतावा हो रहा था. उसके मन का भगवान तो मन का भाव भी जान जाता था.

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