गहराइयों को अपनी मुस्कराहट के पीछे समेटती हुई,
वह किनारे के सहारे उम्मीद में एक बार फिर आयी,
थोड़ी शाम हुई तो उसकी उलझन कुछ और बढ़ी
रात होते होते वह शोर मचाती हुई अपनी परछाई के पार
पद चिन्ह ढूंढती हुई उफान में अपनी सफ़ेद पड़ती बाँहों को,
फैला कर एक बार फिर अपने अंगूठी पर सजे बुलबुलों को
पत्थर और मिट्टी में तोड़कर आसमां में चीखी माँ.
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