घसीट कर वो बछड़े को ले गए. इसलिए कि बेचारा बेजुबां था. जुबां होती तो कब की पोल खुल गई होती. यही कि गऊ माता और भैंस मौसी नहीं हैं. मेहज़ एक जरिया हैँ. पेट पालने का ही नहीं, उस से बहुत उच्च जीवन स्तर का. गाडी, बांग्ला, सैर सपाटा, समाज में सम्मान, दिखावा इत्यादि. इस सब की आहुति ये बेजुबां दे रहा है. बछड़ा गाय हुई तो उसी समय गरीब को माँ से दूर एक खूंटे के साथ तीन फीट जैसी लम्बी रस्सी से बाँध दिया जायेगा. इतनी दरियादिली! आख़िर गऊ माता जो है.उस बछड़े को देख देख कर दूध जो देगी, प्रतिदिन एक इंजेक्शन के बाद. ऐसा दर्द जो उसकी आत्मा हिला दे. बदकिस्मती से यदि बछड़ा बैल निकला तो उसको बीच सड़क पर मरने को छोड़ दिया जायेगा. गाड़ी बँगले के खर्च से इनके लिए चारा जो नहीं कोई खरीद पाता.आपने भी कई बार इनको सड़क पर हॉर्न बजाते हुए पार किया है. इतने छोटे और मासूम होते हैँ कि इन्हे मालूम ही नहीं होता कि सड़क के नियम क्या होते हैँ. बेचारे अनाथ जो हैँ. ऐसा बार बार जबरन गऊ माता को माता बनाया जाता है. इसी बात पर याद आया, भैंस के मांस का निर्यात करने वाले देशों में हम प्रमुख हैँ. क्यूंकि भैंस बेजुबां है, नहीं तो मौसी भेदभाव के बारे में पूछती. शायद ये भी बता देती कि सारी ज़िन्दगी तीन फीट लम्बी रस्सी से बंधकर इंजेक्शन का दर्द, भूसा भरे बछड़े के लिए रोते हुए बँधी हुई टांगों में दूध देना या कई घंटे कट कट कर मरना, उसको क्या अधिक पसंद है.
बकरों की तो पूछो ही मत! बेचारों का वाक्य “मैं “ पूरा ही नहीं हुआ. शायद ये बोलते कि “ मैं मरना नहीं चाहता हूं “. पर इस से पहले ही काट दिए जाते हैँ. वाक्य नहीं, बकरे. अजूबा ये कि इनको मारना भी धर्म के आधार पर तय किया जाता है. बारिश, मौसम, त्यौहार, दावत, खुशी के बहाने. और स्वाद के बहाने. उन 15 बेहतरीन मिनट के लिए, एक बेजुबां जान.
जेल में क़ैद बच्चे. मुर्गी के, सूअर के, अन्य जानवर के. सांस के लिए तड़पती मछली. और ना जाने क्या क्या. हमको दर्शन कराने, माल ढोने के लिए, ऊन के लिए, खाल के लिए …शायद ज़ुल्म की सूची बहुत लम्बी है.
अब हम इस प्रकार की बातों को पढ़ना नहीं चाहते. पर हम ये सब ख़ुद कर या पैसे देकर करवा सकते हैँ. क्यूंकि जानवरों के पास ज़बान नहीं. इनको कटते हुए देखना. उनकी जुबां तो है, हम सिर्फ उनकी चीख को सुनना नहीं चाहते. ये बेजुबां नहीं है. हम बेहरे हैँ और हमारी आत्मा भी.
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